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ED: सबसे पावरफुल जांच एजेंसी के बारे में जानिए

 

सबसे पावरफुल जांच एजेंसी है प्रवर्तन निदेशालय(ED)?



इस आलेख को क्यों पढ़ें
  • ईडी के अधिकारों के बारे में जानने के लिए?
  • क्या कारण बताए बिना अरेस्ट कर सकती है ईडी?
  • ईडी के ख़िलाफ़ 250 याचिकाएं क्यों दाखिल हुईं?
  • सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की शक्तियों के बारे में क्या फैसला दिया?



एक वक़्त था, जब देश में सीबीआई यानी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन सबसे चर्चित जांच एजेंसी हुआ करती थी। कोई कांड कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगता था कि उसकी जांच सीबीआई कर रही है या फिर नहीं। सीबीआई ने कई बड़े मामलों को सुलझाया, तो अक्सर इसके दुरुपयोग के आरोप भी लगे। लेकिन, अब सीबीआई से ज़्यादा चर्चा ईडी की होती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कामकाज का दायरा। सीबीआई की शक्तियां जहां आपराधिक मामलों तक ही सीमित रहीं, वहीं ईडी के कामकाज का दायरा काफी बढ़ गया। अगर किसी आपराधिक मामले का भी कोई वित्तीय एंगल निकलता है, तो ईडी उस जांच में शामिल हो जाती है। आइए समझते हैं कि ईडी काम कैसे करती है और इसके अधिकार क्या हैं



कैसे बनी एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट
ईडी अस्तित्व में आई साल 1956 में। तब यह वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में एक 'एनफोर्समेंट यूनिट' हुआ करती थी। साल 1957 में इसका नाम हो गया एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट। शुरुआत में यह सिर्फ एक्सचेंज कंट्रोल लॉ का उल्लघंन करने वाले मामलों की छानबीन करती। उस वक़्त इसकी सिर्फ दो शाखाएं थीं - एक बॉम्बे (अब मुंबई) और दूसरी कलकत्ता (अब कोलकाता) में। अब हालांकि ईडी की शाखाएं 29 जोन में फैल चुकी हैं। साल 1960 में ईडी का प्रशासनिक अधिकार राजस्व विभाग को दे दिया गया। बीच में चार साल यानी 1973 से 1977 तक ईडी पर कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग का भी नियंत्रण था।



किन क़ानूनों के तहत काम करती है ईडी?
ईडी किसी भी बड़े मामले का वित्तीय एंगल निकलने पर उसकी जांच में शरीक हो जाती है। लेकिन, यह ख़ासतौर पर तीन क़ानूनों के दायरे में काम करती है। ये क़ानून हैं - विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 (FEMA), धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 (PMLA) और भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम 2018 (FEOA)। अगर फॉरेन एक्सचेंज में किसी किस्म की गड़बड़ी होती है, कोई जालसाजी करके पैसे बनाने या बचाने की कोशिश करता है, तो ईडी FEMA के तहत उसकी नकेल कसती है।







कैसे बनी एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट
ईडी अस्तित्व में आई साल 1956 में। तब यह वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में एक 'एनफोर्समेंट यूनिट' हुआ करती थी। साल 1957 में इसका नाम हो गया एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट। शुरुआत में यह सिर्फ एक्सचेंज कंट्रोल लॉ का उल्लघंन करने वाले मामलों की छानबीन करती। उस वक़्त इसकी सिर्फ दो शाखाएं थीं - एक बॉम्बे (अब मुंबई) और दूसरी कलकत्ता (अब कोलकाता) में। अब हालांकि ईडी की शाखाएं 29 जोन में फैल चुकी हैं। साल 1960 में ईडी का प्रशासनिक अधिकार राजस्व विभाग को दे दिया गया। बीच में चार साल यानी 1973 से 1977 तक ईडी पर कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग का भी नियंत्रण था।


Explained how ED works

वहीं, PMLA क़ानून में मनी लॉन्ड्रिंग की छानबीन होती है और अवैध संपत्तियों को ज़ब्त किया जाता है। मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में सात से 10 साल तक की कैद या फिर कैद और जुर्माना, दोनों लगाया जा सकता है। आर्थिक अपराधी अमूमन जालसाजी करके मुजरिमों के पनाहगार माने जाने वाले देशों में भाग जाते हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए ईडी को FEOA के रूप में एक कारगर हथियार दिया गया है। इसके तहत जांच एजेंसी भगोड़े आर्थिक अपराधी की संपत्तियों को ज़ब्त कर सकती है, उनकी कुर्की करवा सकती है।

ईडी के कामकाज का तरीका क्या है?
अगर सीबीआई की बात करें, तो वह अमूमन केंद्र सरकार या फिर अदालत का आदेश मिलने पर किसी ख़ास मामले की छानबीन करती है। राज्य से जुड़े मामलों की जांच के लिए उसे संबंधित सरकार से इजाज़त लेनी पड़ती है। लेकिन, ईडी के मामले में ऐसा नहीं है। किसी भी थाने में एक करोड़ या उससे ज़्यादा की हेराफेरी का मामला दर्ज होने पर पुलिस उसकी जानकारी ईडी को देती है। फिर ईडी थाने से एफआईआर या चार्जशीट की कॉपी लेकर जांच शुरू कर सकती है। ईडी को अगर पुलिस से पहले मामले की जानकारी लग जाती है, तब भी वह जांच शुरू कर सकती है।


ईडी की ताकत अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह पूछताछ के बिना भी संपत्ति ज़ब्त कर सकती है। किसी आरोपी की गिरफ्तारी के वक़्त जांच एजेंसी कारण बताएगी या नहीं, यह उसकी मर्जी पर निर्भर है। ईडी के अगर एक भी अधिकारी के सामने बयान दिया गया है, तो वह अदालत में सबूत माना जाता है। इसकी गिरफ्तारी में जमानत भी मुश्किल होती है। FEMA और PMLA मामलों में ईडी तीन साल तक आरोपी की जमानत रोक सकती है। भगोड़े अपराधियों की संपत्ति कुर्क कर सकती है और केंद्र सरकार से अटैच कर सकती है।


ईडी के ख़िलाफ़ क्यों दायर हुई याचिका?
आर्थिक अपराधियों की नकेल कसने के लिए ईडी को असीमित शक्तियां दी गई हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि ज़्यादा पावरफुल होने की वजह से ईडी का दुरुपयोग भी होता है, इसलिए इसकी शक्तियों पर अंकुश लगाने की ज़रूरत है। यही वजह है कि PMLA के कई प्रावधानों के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में करीब 250 याचिकाएं दाखिल गईं। इनमें ख़ासतौर पर ईडी के संपत्ति की तलाशी लेने, ज़ब्त करने और कुर्की करने के अधिकार पर सवाल उठाया गया।

इसमें यह भी कहा गया कि अपनी बेगुनाही का सबूत लाना आरोपी का काम नहीं होना चाहिए। साथ ही ईडी के सामने दिए गए बयान को अदालत में सबूत नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि एजेंसी किसी आरोपी पर दबाव डालकर मनचाहा बयान दर्ज करवाने के लिए मजबूर कर सकती है। याचिकाकर्ताओं की यह भी मांग थी कि आरोपी को एनफोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (ECIR) और फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) की एक कॉपी मिलनी चाहिए, जो फिलहाल ईडी नहीं देती। उनकी यह भी दलील थी कि PMLA के तहत किए अपराधों के लिए औसत सजा सात साल है, इसलिए इसे गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता है। ऐसे में जमानत की प्रक्रिया को और सरल किए जाने की ज़रूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ताओं की अधिकतर दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। ECIR देने के मामले पर कोर्ट ने कहा कि यह चूंकि ईडी का अंदरूनी दस्तावेज है, तो ऐसे में ज़रूरी नहीं कि इसे आरोपी के साथ साझा किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर जांच एजेंसी गिरफ्तारी के वक़्त कारण बता देती है, तो आरोपी के लिए उतनी जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए। वैसे भी आरोपी के पास अदालत में मौका होता है कि वह किसी भी अतिरिक्त जानकारी के लिए गुजारिश कर सके।

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के सामने आरोपी के कबूलनामे के ख़िलाफ़ दी गई दलीलों को भी पुख्ता नहीं माना। उसने कहा कि ईडी के अफ़सर पुलिस नहीं हैं। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वो सिर्फ जेल भेजने की धमकी देकर किसी को अपने ख़िलाफ़ झूठ बोलने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि बेगुनाही का सबूत जुटाने का जिम्मा आरोपी पर ही होना चाहिए, क्योंकि PMLA के कुछ क़ानूनी प्रावधानों के चलते यह ज़रूरी है। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने PMLA ऐक्ट के तहत ईडी को दिए गए अधिकारों को सही बताते हुए सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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