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ज्ञान खरीदा नहीं जा सकता,राजन, स्पष्ट जान लें कि ब्रह्मज्ञान कुछ देकर नहीं खरीदा जा सकता। मैं ज्ञान बैचने का व्यापार नहीं करता।"

 मुनि रैक्व ने कहा, 'राजन, स्पष्ट जान लें कि ब्रह्मज्ञान कुछ देकर नहीं खरीदा जा सकता। मैं ज्ञान बैचने का व्यापार नहीं करता।"  ज्ञान खरीदा नहीं जा सकता  उन्होंने भार को आदेश दिया कि वह अंतर्यात्रा सकता है। राजा फिर मुनि रैक्व के पास  पता लगाए कि मुनि रैक्व कहां मिलेंगे। शिवकुमार गोयल पहुंचे और कहा, 'मेरी पुत्री को धर्मपत्नी  रखें। मैं निर्जन वन में ही पूर्ण संतुष्ट हूं। राजा निराश लौट आया। उन्होंने सोचा कि यदि उससे कई गुना धन संपत्ति तथा अपनी पुत्री भी उन्हें सौंप दूँ, तो शायद उनसे ज्ञान प्राप्त किया जा के रूप में स्वीकारें और इस धन को दहेज समझें।' मुनि रैक्व ने उत्तर दिया, 'राजन, स्पष्ट जान लें कि ब्रह्मज्ञान कुछ देकर नहीं खरीदा जा सकता। मैं ज्ञान बैचने का व्यापार नहीं करता। राजा जनश्रुति यह सुनते ही उनके चरणों में लोट गए। अभिमान दूर होते ही मुनि रैक्व ने उन्हें ज्ञान प्रदान किया।  राजा जनश्रुति ने ब्रह्मज्ञानी मुनि रैक्व की विरक्ति और ज्ञान की प्रशंसा सुनी, तो वह उनका सत्संग करने के लिए। लालायित हो उठे। उन्हें पता चला कि रैक्व बैलगाड़ी में ही विचरण करते है...