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खुश होना या दुखी होना हमारा चुनाव है


 

हमें खुश होना है या दुखी होना है, यह चुनाव हमेशा हमारे हाथ में रहता है. सामान्यत: हमें लगता है कि दुख या खुशी हमारे पास चलकर आते हैं. वे घटनाओं और सूचनाओं के जरिए हम पर आकर बरसते हैं. निस्संदेह हमारे पास अच्छी और बुरी खबरें आती रहती हैं, हमारे रोजमर्रा के जीवन में अच्छी और बुरी घटनाएं भी घटती रहती हैं, लेकिन यह हमेशा हम पर निर्भर करता है कि हम किसी अच्छी खबर से कितना खुश होते हैं और किसी बुरी खबर से कितना दुखी होते हैं. दुखी होते भी हैं या नहीं.

हम चाहें अगर तो अच्छी खबर से खुश होने और बुरी खबर को नजरअंदाज करने जैसा आदर्श समीकरण अपनाकर हर स्थिति में जीवन का भरपूर लुत्फ लेते रह सकते हैं. इस बात को समझें कि हमें बाहरी घटनाएं या हम तक पहुंचने वाली बुरी खबर दुखी नहीं करती, बल्कि दुखी होना इस बात पर निर्भर करता है कि हम उनके बारे में कितना और किस तरह से सोचते हैं. जी हां, कितना सोचते हैं, इस बात का भी बहुत फर्क पड़ता है क्योंकि अगर उनके बारे में ज्यादा सोचेंगे, तो हमारा सोचना हमारे भीतर भाव पैदा करने लगेगा.

किसी भी चीज के बारे में ज्यादा सोचने से उसे लेकर हमारे भीतर इमोशंस गहरे होने लगते हैं. उनके बारे में हम क्या सोचते हैं, इसका भी सीधा असर हमारे मन पर पड़ता है. मसलन,हमने नौकरी के लिए कोई इंटरव्यू दिया और फेल हो गए, तो हम इसे एक सुनहरा अवसर गंवा देने के रूप में देखकर दुखी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे अपनी तैयारी में कमी मानकर सहज भाव से भी ले सकते हैं और अब मेहनत से तैयारी करने का संकल्प कर सकते हैं.

कई बार लोगों के साथ ऐसा भी हुआ है कि वे एक छोटी से नौकरी से चूक गए, इसलिए उन्हें बाद में बड़ी नौकरी मिली क्योंकि वे छोटी नौकरी, छोटी सफलता पा लेते, तो बड़ी की तैयारी ही नहीं करते. सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति अपने इंटरव्यू में फेल होने को इस नजरिए से भी देख सकता है और फेल होने पर खुश भी हो सकता है. यानी जब हम पर निर्भर है कि हम सोचते कैसे हैं, सोचते क्या हैं.

कोई व्यक्ति हमें अपशब्द बोलता है, तो यह उसकी तकलीफ है. उसके भीतर क्रोध पैदा हुआ है जिसका उसे ही खामियाजा भुगतना पड़ेगा. उसके अपशब्दों से हमें दुखी होने की जरूरत नहीं. इसे गौतम बुद्ध की एक कथा से समझने की कोशिश करें.   

एक बार गौतम बुद्ध एक गांव से गुजर रहे थे. तभी उनके सामने एक गुस्से से भरा नौजवान आकर गालियां देने लगा. वह उनके खिलाफ अनाप-शनाप बोलते हुए उनका अपमान कर रहा था.

“तुम्हें दूसरों को शिक्षा देने का कोई अधिकार नहीं है,” वह चिल्लाया.

“तुम दूसरों जैसे ही सामान्य इंसान हो. तुम नकली हो.”

बुद्ध पर उसकी अपमान भरी बातों का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ा. उन्होंने मुस्कराते हुए उस युवक से एक साधारण-सा सवाल पूछा –

“यह बताओ कि अगर तुम किसी के लिए कोई उपहार खरीदो और वह व्यक्ति तुम्हारा उपहार लेने से इंकार कर दे, तो उपहार किसके पास रहेगा?”

बुद्ध से ऐसा अजीब सवाल सुन थोड़ा हैरान होते हुए युवक ने जवाब दिया –

“वह मेरे पास रहेगा क्योंकि मैंने उसे खरीदा था.”

उसका जवाब सुन बुद्ध ने फिर मुस्कराते हुए कहा –

बिल्कुल सही कहा तुमने. ठीक यही तुम्हारे गुस्से के साथ भी होता है. अगर तुम मुझे अपशब्द बोलते हो और मैं उन्हें स्वीकार नहीं करता, वे अपशब्द तुम पर ही अपना असर दिखाते हैं. तुम्हारे गुस्से को मैं स्वीकार नहीं करता, तो वह गुस्सा तुम पर ही प्रभाव छोड़ता है. तुम अगर खुद को चोट नहीं पहुंचाना चाहते, तो तुम्हें गुस्से से बाहर निकलकर प्रेम की राह पर चलना होगा. जब तुम दूसरों से नफरत करते हो, तो तुम खुद को ही पीड़ा देते हो, खुद को ही तकलीफ देते हो, लेकिन जब तुम दूसरों को प्रेम देते हो, तो सब आनंद में रहते हैं.

जिस तरह गौतम बुद्ध ने युवक के अपशब्दों को लेने से इंकार कर दिया, उसी तरह हम घटनाओं और खबरों से अपने लिए दुख लेने से इंकार कर सकते हैं. हमें सिर्फ अपने सोचने के ढंग को लेकर सतर्क होने की जरूरत है कि हम नकारात्मक न सोचें. हर चीज के दो पक्ष होते हैं – अंधकार भरा और उजला. हम अगर उजला पक्ष देखेंगे, तो कभी दुखी नहीं होंगे.

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