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दीपावली क्यों मनाई जाती है?यहाँ सदगुरु दुनिया के सबसे ज्यादा उल्लासमय, समृद्ध त्योहारों में से एक, दिवाली का आध्यात्मिक महत्व समझा रहे हैं, जिससे आपको एकदम नये ढंग से दिवाली के महत्व को समझने का मौका मिलेगा।

 



विषय सूची

1. दिवाली क्या है और इसे प्रकाश पर्व क्यों कहते हैं?

2. दिवाली क्यों मनायी जाती है?

3. दिवाली का महत्व

4. जीवन एक उत्सव है

5. बिना गंभीर हुए पूरी तरह से जीवन में शामिल रहिये

#1. दिवाली क्या है और इसे प्रकाश पर्व क्यों कहते हैं?

सदगुरु : दिवाली (दीपावली) प्रकाश पर्व या प्रकाश का त्योहार है। हमारे देखने के साधन यानि हमारी आँखों की बनावट के कारण ही इंसान के जीवन में प्रकाश का इतना महत्व है। बाकी प्राणियों के लिये प्रकाश का मतलब उनका टिके रहना ही है, पर मनुष्य के लिये प्रकाश सिर्फ देखने या न देखने की बात नहीं है। प्रकाश का आना हमारे जीवन में एक नयी शुरुआत का सूचक होता है और, उससे भी ज्यादा ये हमें स्पष्टता देता है। ज्यादातर प्राणी अपनी प्रकृति, अपने स्वभाव के हिसाब से जीते हैं जिसकी वजह से, क्या करना है और क्या नहीं करना, इसके बारे में उन्हें ज्यादा उलझन नहीं होती। एक छोटा बाघ कभी बैठे बैठे ये नहीं सोचता, "क्या मैं अच्छा बाघ बनूँगा या बस कोई पालतू बिल्ली बन कर रह जाऊँगा"? वो बस अगर अच्छी तरह खाता है तो वो अच्छा बाघ ही बनेगा। 

आपका जन्म एक इंसान के रूप में हुआ है पर एक अच्छा इंसान बनने के लिये आपको बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं और उसके बाद भी आपको पता नहीं होता कि आप कहाँ हैं! हाँ, किसी से तुलना करते हुए आपको लग सकता है कि आप उससे बेहतर हैं पर अपने आपमें आप कहाँ हैं, कैसे हैं, आप नहीं जान सकते। मनुष्य की बुद्धिमानी कुछ ऐसी होती है कि अगर आप उसे सही ढंग से संगठित नहीं करते, इस्तेमाल नहीं करते तो जिन प्राणियों के मस्तिष्क आपके मस्तिष्क के लाखवें भाग के बराबर भी नहीं हैं, उनकी तुलना में आपको जबर्दस्त दुख होगा, बहुत ज्यादा उलझन होगी क्योंकि वे सभी प्राणी हर बात में बहुत स्पष्ट होते हैं, जैसे इंसान नहीं होते। एक केंचुआ, कोई कीड़ा भी आसानी से जानता है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना पर इंसान को ये पता नहीं होता। ये बुद्धिमानी ही हमें उलझन में डालती है, हमारी बुद्धि की काबिलियत की वजह से ही हम हमेशा संघर्ष की अवस्था में रहते हैं।


एक केंचुआ, कोई कीड़ा भी आसानी से जानता है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना पर इंसान को ये पता नहीं होता। ये बुद्धिमानी ही हमें उलझन में डालती है, हमारी बुद्धि की काबिलियत की वजह से ही हम हमेशा संघर्ष की अवस्था में रहते हैं।

बुद्धिमानी एक जबर्दस्त संभावना होने की बजाय बहुत सारे लोगों के लिये समस्या बन जाती है। वे अपनी तकलीफों को अलग अलग नाम दे सकते हैं, जैसे, तनाव, चिंता, अवसाद, पागलपन या दुख। पर, मूल रूप से इसका मतलब यही है कि उनकी बुद्धिमानी ही उनके खिलाफ काम कर रही है। अगर आप किसी और के द्वारा आपको कोई तकलीफ दिये बिना, अपने आप से दुखी हो रहे हैं तो इसका मतलब यही है कि आपकी बुद्धिमानी आपके खिलाफ काम कर रही है। इंसान के अस्तित्व का ये स्वभाव होने की वजह से स्पष्टता ही सबसे ज्यादा अहम बात है। इसीलिये, प्रकाश महत्वपूर्ण है। प्रकाश का मतलब है स्पष्टता। दिवाली का त्योहार भी इसीलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि ये स्पष्टता को समर्पित है जो आपके अंदर की अस्पष्टता, उलझनों को दूर करने की प्रेरणा देता है।


#2. दिवाली क्यों मनायी जाती है? 



ऐतिहासिक रूप से ये वो दिन है जब कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उसका मूल नाम नरकासुर नहीं था पर वो लोगों के जीवन को यातना दे देकर नर्क बना देता था, और इसीलिये लोग उसे नरकासुर कहने लगे। जो दूसरों को दुख, तकलीफ, नरक दे वो नरकासुर है। जब कृष्ण ने इस यातना देने की प्रक्रिया का अंत कर दिया, तो लोगों ने हर घर में दिये जला कर उत्सव मनाया। नरकासुर को मारने की घटना तो खैर बहुत बाद में हुई, पर इस दिन के आसपास के समय में दिये जलाने की परंपरा और संस्कृति 12 से 15000 साल पुरानी है। लोगों ने ये समझ लिया था कि साल के इस समय में उनके जीवन में एक तरह की जड़ता आ जाती थी। तो विचार ऐसा था कि अगर आप एक दिये, एक पटाखे की तरह पूरी तरह से जीवंत, सक्रिय नहीं हैं तो अपने आसपास दिये और पटाखे जलाने से आप कुछ तो जाग जायेंगे। यही वजह है कि नर्क चतुर्दशी के दिन सुबह 4 बजे से ही पटाखे चलाये जाते हैं जिससे हर कोई जाग जाये, जीवंत हो जाये।


दिवाली एक प्रतीक है - जड़ता को मिटाने का- क्योंकि जड़ता ही नर्क का स्रोत है। जब आप में जड़ता आ जाती है तो आप नर्क नहीं जाते बल्कि नर्क ही हो जाते हैं।

दिवाली एक त्योहार ज़रूर है पर महत्वपूर्ण चीज़ है जड़ता को मिटाना। जीवन समय और ऊर्जा का खेल है। आपके पास एक खास मात्रा में समय है और एक खास मात्रा में ऊर्जा है। आप चाहे बीमार हों या स्वस्थ, आलस में पड़े हों या पूरी तरह व्यस्त हों, समय तो गुजर ही जाता है। समय हम सभी के लिये एक ही गति से चलता है। कोई इसे धीमा या तेज नहीं कर सकता पर आप खुशी में हैं या दुखी हैं, इससे आपका समय का अनुभव अलग अलग होता है। आप अगर उल्लासित हैं तो चौबीस घंटे भी एक पल में गुज़र गये ऐसा लगता है, और अगर आप अवसाद में हैं तो चौबीस घंटे युगों की तरह लगेंगे।


अगर आप मजे में हैं, तो जीवन बहुत ही छोटा लगता है। एक इंसान में जिस तरह की क्षमता है, अगर आप 100 साल भी जीते हैं तो भी ये सभी साल बहुत जल्दी गुज़र जाने वाले लगेंगे पर अगर आप में जड़ता आ गयी हो तो ऐसा लगेगा जैसे समय गुज़र ही नहीं रहा। जब लोग दुखी होते हैं, तब मनोरंजन की जरूरत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है पर जब वे खुश होते हैं, तो मनोरंजन की कोई जरूरत नहीं रह जाती और उनके पास इसके लिये समय ही नहीं होता। आपकी खुशी आपका सारा समय ले लेती है। ऐसे में आप सुबह उठते हैं और इससे पहले कि आपको कुछ पता भी चले, रात हो जाती है। जब आप खुश हैं तो आप वो सब करेंगे जो आप कर सकते हैं पर जब आप दुखी हैं तो आप हर चीज़ टालना चाहते हैं।


"आज शुक्रवार है, ईश्वर को धन्यवाद"! इस तरह की संस्कृति आजकल बहुत बढ़ रही है। इसका मतलब ये है क़ि लोग ऐसा समझते हैं कि सप्ताह में (काम के) 5 दिन दुख के और बाकी 2 (छुट्टी के) दिन मौज मस्ती के, बल्कि, सामान्य रूप से नशे की मस्ती के लिये!! अगर आप चाहते हैं क़ि लोग हँसें, गायें, नाचें या कुछ खुशी से भरा करें तो आपको उन्हें नशा कराना पड़ता है, कम से कम शराब का एक गिलास, नहीं तो ये हँसी - खुशी संभव ही नहीं। ये इसलिये होता है क्योंकि काफी वजहों से लोग अपने अंदर जड़ता बना रहे हैं। जड़ता आने पर ज़िंदगी बहुत लंबी लगती है। दीवाली एक प्रतीक है - जड़ता को मिटाने का - क्योंकि जड़ता ही नर्क का स्रोत है। जब आपमें जड़ता आ जाती है तो आप नर्क नहीं जाते, नर्क ही हो जाते हैं। डर, नफरत, ईर्ष्या और गुस्से में आप एक नर्क बना केते हैं और नरकासुर बन जाते हैं। इन्हें दूर कर दिया जाये तो एक नया प्रकाश चमकता है।


#3. दिवाली का महत्व


दिवाली के दिन हर शहर, कस्बा और गाँव हज़ारों दियों की रोशनी से जगमगाता है पर ये उत्सव सिर्फ बाहर के दिये जलाने के लिये नहीं है। अंदरूनी प्रकाश आना ज़रूरी है। प्रकाश का अर्थ है स्पष्टता। बिना स्पष्टता के, आपके पास दूसरे जो भी गुण हों, वे आपके लिये कोई उपहार नहीं होंगे, बल्कि बाधायें बन जायेंगे क्योंकि बिना स्पष्टता के विश्वास भी विपत्ति है और आज तो सारी दुनिया में बहुत सारा काम बिना स्पष्टता के ही होता है।


एक दिन, एक शहर में, एक नया नवेला पुलिस सिपाही अपने एक अनुभवी साथी के साथ पहली बार ही गाड़ी चला कर जा रहा था। तभी उन्हें रेडियो पर संदेश मिला कि किसी गली में बहुत से लोगों का समूह इकट्ठा हो गया था, तो इन्हें आदेश मिला कि उन्हें जा कर बिखरायें जिससे भीड़ जमा न हो। वे वहाँ पहुँचे और उन्हें एक कोने में बहुत से लोग इकट्ठे हुए दिखाई पड़े। जब वे वहाँ पहुँचे तो उस नये पुलिस वाले ने बहुत ही उत्साहित होकर कार का शीशा नीचे किया और चिल्लाया, "ऐ, तुम सब! चलो, हटो वहाँ से, जाओ"! लोग एक दूसरे की ओर उलझन भरी नजरों से देखने लगे"। तब, वो और जोर से चिल्लाया, "अरे, क्या तुम लोगों ने सुना नहीं, मैंने तुम लोगों से वहाँ से हटने को कहा है"! तब वे लोग वहाँ से चले गये। अपने पहले अधिकारिक कामकाज में अपनी सफलता पर खुश होते हुए उसने अपने अनुभवी साथी से पूछा, "क्यों, मैंने अच्छा किया न"? वो बोला, "हाँ, कुछ खराब नहीं था क्योंकि वो एक बस स्टॉप है"!


जीवन का रहस्य यही है - हर चीज़ को बिना बहुत गंभीर हुए पर पूरी तरह शामिल हो कर देखना - जैसे कोई खेल चल रहा हो!

#4.जीवन एक उत्सव है



भारतीय संस्कृति में, एक समय ऐसा था जब साल के हर दिन कोई न कोई उत्सव होता था - साल में 365 त्योहार! इसके पीछे का विचार यही था कि हम सारे जीवन को एक उत्सव ही बना दें। अब तो बस 30 - 40 त्योहार ही बच गये हैं और हम इन्हें भी नहीं मना पाते क्योंकि हर रोज ऑफिस जाने का या और कुछ न कुछ काम करना होता है। तो साल में लोग बस 8 - 10 उत्सव ही मना पाते हैं। हम अगर इसे ऐसे ही चलने देंगे तो अगली पीढ़ी के पास कोई त्योहार ही नहीं होगा। उन्हें पता ही नहीं रहेगा कि पर्व, त्योहार, उत्सव क्या होता है? वे बस कमायेंगे और खायेंगे! कमायेंगे और खाएंगे!!बस, यही करते हुए जीवन बितायेंगे।


बहुत से लोगों के लिये ये स्थिति आ ही आ चुकी है। त्योहार का मतलब बस अब यही रह गया है कि आपको काम से छुट्टी है और आप सुबह नहीं बल्कि दोपहर में उठते हैं। फिर आप रोज के मुकाबले ज्यादा ही खाते हैं, सिनेमा देखने जाते हैं या घर पर ही टीवी देखते हैं। ऐसे लोग तभी नाच, गा सकते हैं जब वे कोई बाहरी उत्तेजक (स्टिम्युलेंट) पदार्थ ले लें नहीं तो ये लोग नाच, गा भी नहीं सकते। पहले ऐसा नहीं था। त्योहार का मतलब था कि सारा गाँव एक जगह इकट्ठा होता था और लोग एक बड़ा उत्सव मनाते थे। त्योहार के दिन लोग सुबह चार बजे उठते थे और सारे घर में बहुत सारी चीजें बड़ी सक्रियता के साथ होतीं थीं। ये संस्कृति वापस लाने के लिये, ईशा साल में 4 महत्वपूर्ण त्योहार मनाती है - पोंगल या मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, दशहरा और दिवाली।


#5.बिना गंभीर हुए पूरी तरह से जीवन में शामिल रहिये

अगर आप हर चीज़ एक उत्सव मनाने के ढंग से करते हैं तो आप जीवन में बिना गंभीर हुए पूरी तरह से शामिल होना सीख लेते हैं। अभी तो ज्यादातर लोगों के साथ समस्या ये है कि अगर उन्हें लगता है कि कोई चीज़ बहुत महत्वपूर्ण है तो वे बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। जो चीज़ महत्वपूर्ण नहीं लगती, उसके लिये वे लापरवाह रहते हैं और उसके साथ जरूरी लगाव नहीं रखते। जब कोई कहता है, "वो बहुत गंभीर हालत में है" तो इसका मतलब यही होता है कि उसका अंत नज़दीक है। दुनिया में बहुत सारे लोग गंभीर हालत में होते हैं। उनके लिये अब अगर कोई चीज़ अहम हो सकती है तो बस वो एक ही है जिसके लिये वो इतने गंभीर हैं। बाकी सब चीजें ऐसे ही निकल जायेंगी क्योंकि जो चीज़ उन्हें गंभीर या अहम नहीं लगती उसके लिये उन्हें कोई लगाव नहीं होता, वे उसके साथ शामिल ही नहीं होते। यही सबसे बड़ी समस्या है।


जीवन का रहस्य यही है - हर चीज़ को, बिना गंभीर हुए पर पूरी तरह शामिल हो कर देखना - जैसे कोई खेल चल रहा हो। यही वजह है कि हमारी संस्कृति में जीवन के सभी पहलुओं को एक उत्सव की तरह हम हाथ में लेते हैं जिससे आप ये बात न भूलें। दिवाली के पीछे का विचार भी यही है कि ये उत्सव मनाने का पहलू आपके जीवन में आये।



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