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पति 15000 या 5 लाख कमाए, पत्नी को पीटना आम: घरेलू हिंसा कानून बनाने में लगे 145 साल, बेटे सीख रहे हाथ उठाना


Dsnews



 सहनशीलता छोड़ें खामोशी तोड़ें


 बात 1983 की है, जब देश में सैकड़ों की संख्या में महिलाएं चिलचिलाती धूप में सड़कों पर उतर आई थीं। ये महिलाएं न तो बढ़ती महंगाई से परेशान थीं और न ही बेरोजगारी उनके लिए कोई मुद्दा था। ये औरतें अपनी बेटियों की वजह से घर से निकल सड़कों पर आ गई आ गई वो बेटियां, जिनके मां-बाप ने बड़े अरमान से ब्याहा था। मगर, उनकी इन लाडली बेटियों के लिए उनका ससुराल नर्क साबित हुआ। ज्यादातर बेटियां दहेज के लिए मारी - पीटी गईं और कई तो जान से भी गईं। घरेलू हिंसा की शिकार इन बेटियों में से बहुतों ने चुपचाप ही जुल्म सहे और जो नहीं सह पाईं, उन्होंने खुदकुशी कर ली। इन बेटियों की मांएं सड़क पर उतरीं तो सरकार और संसद तक इनकी गूंज सुनी गई।


 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन महिलाओं की आवाज सुनी और इंडियन पीनल कोड यानी IPC में धारा 498 ए जोड़ी गई, जिसमें घरेलू हिंसा की भी बात थी, क्योंकि हमारी सोसायटी में कोई ये मानने को राजी ही नहीं था कि औरत का अपने ही घर में पिटना गलत है और ये घरेलू हिंसा है। 2005 में घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून बनने के बावजूद आज भी घरों में महिलाओं से मार-पीट आम बात है। भारत 1860 में अपराधों को रोकने के लिए IPC तैयार किया गया, लेकिन इसके करीब 150 साल बाद जाकर घर की चारदीवारी में महिलाओं पर होती हिंसा को रोकने के लिए कानून बना ।


 हर तीन में से एक महिला घरेलू हिंसा की शिकार

 संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर तीन में से एक महिला कभी न कभी घरेलू हिंसा की शिकार होती है।

 नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक, देश में 31 प्रतिशत विवाहित महिलाएं गंभीर रूप से घरेलू हिंसा की शिकार हैं।


 भारत के गांवों में 33% लोग बीवियों को पीटते हैं, वहीं शहर में 24% लोग पत्नी पर हाथ उठाते हैं।


 अब आइए दो केस से इस समस्या और इसकी क्रूरता को समझते हैं


 पहली घटना : 'पति देर रात घर आया और मुझे खींचता हुआ कमरे में ले गया। आव देखा न ताव दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए। मैंने पूछा- क्या हुआ। जवाब में मेरा सिर आलमारी पर दे मारा। मैं लड़खड़ा कर गिर गई तो लात-घूंसे बरसाने लगा। मैंने हाथ जोड़े-पैर पकड़े, पति से रहम की भीख मांगी। इस पर उसने मेरे मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि आवाज कमरे से बाहर न जाए। मेरे हाथ-पैर बांधकर बालों से पूरे कमरे में घसीटा। फिर गला दबाया। थप्पड़ मारकर चेहरा बिगाड़ दिया। मेरी सांसें अटक गईं, आंखों से दिखाई देना बंद हो गया। मुझे मरा समझकर दरवाजा बंदकर बाहर चला गया।' यह आपबीती 29 साल की अशफिया की है, जो पति से टॉर्चर होने के बाद इन दिनों हापुड़ रोड पर एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवा रही हैं। पति शादी के बाद से ही दहेज की मांग को लेकर अशफिया को परेशान कर रहा था। उस रात भी उसने शराब पीकर दहेज की मांग को लेकर ही मारपीट की थी।


 दूसरी घटना: एक कंपनी में HR हेड के तौर पर कार्यरत अनीता ( बदला हुआ नाम) को पति ने दूध उबलकर गिर जाने जैसी छोटी सी बात पर रूई की माफिक धुन डाला। तंग आकर अनीता ने दिल्ली के रोहिणी स्थित महिला थाने में पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। ऐसा पहली दफा नहीं हुआ है। इससे पहले भी बच्चे


 शालिनी ये सब सहती है, क्यों? इसके जवाब में वो चारू ने बताया कि ये समस्या शालिनी की ही नहीं, ज्यादातर महिलाओं की है। उसे लगता है कि घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई की महंगी फीस, लाइफस्टाइल का खर्च सब पति की कमाई पर टिका है। अगर वह शिकायत करती है तो उसके लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।


 जब जज ने कहा, 'पत्नी को ऐसे मारो कि दिखाई न दे' साल 1882 में अमेरिकी प्रांत मेरीलैंड दुनिया की


 पहली ऐसी जगह थी, जिसने पत्नी की पिटाई करने वाले पतियों के लिए 40 कोड़े या ज्यादा नुकसान पहुंचाने पर एक साल की सजा का नियम बनाया। ज्यादा नुकसान से मतलब पत्नी के चेहरे या शरीर के उन हिस्सों पर चोट से है, जो दिखाई दें।


 के रोने, या फिर कपड़े धोने के वक्त शर्ट का बटन टूटने, पसंद की सब्जी न बनने दफ्तर से लौटने में देरी होने और उस पर भी फोन व्यस्त जाने जैसे मुद्दों पर लात-घूंसे बरसते रहे, लेकिन इस बार अनीता के सब्र का बांध टूट गया। मामला अब पुलिस के पास है।


 सबसे ज्यादा और सबसे कम घरेलू हिंसा की दर वाले राज्य सबसे अधिक

 सबसे कम

 लक्षद्वीप 1.3

 बिहार 40

 नगालैंड 6.4

 मणिपुर 39.6

 गोवा 8.3

 तेलंगाना 38.1

 हिमाचल 8.3

 असम 36..9

 जम्मू-कश्मीर 9.6

 सोर्स: एनएफएचएस सर्वे-5

 आइए सबसे पहले समझते हैं कि घरेलू हिंसा क्या है..... घरेलू हिंसा का मतलब सिर्फ पति का पत्नी को पीटना, घसीटना

 और जलील करना नहीं है। किसी महिला को पति या उसके परिवार की ओर से फिजिकल, मेंटल, सेक्सुअल या फिर फाइनेंशियल यातना देना ही घरेलू हिंसा है। यह पुरुष दादा, पिता, चाचा, ताऊ, भाई, पति या फिर बेटा हो सकता है, लेकिन ज्यादातर घरेलू हिंसा के मामले पति से जुड़े होते हैं।


 हमारा समाज कैसे हजम कर लेता है घरेलू हिंसा? घरेलू हिंसा क्यों होती है और हमारा समाज इसे कैसे हजम कर लेता है। इसके लिए हमें अपने परिवार में ही झांकना होगा। एक बच्चा जब अपने बाप को मां या बहन के साथ रोजाना डांटते, डपटते और हाथापाई देखते हुए बड़ा होता है तो उसके लिए ये सारी बातें मामूली हो जाती हैं । उसे लगता है कि पिता का व्यवहार नॉर्मल है और इस तरह की क्रूरता या हरकतें करना गलत नहीं है। दूसरा, वह मां को चुपचाप सहते हुए देखता, मां को जवाब नहीं देते या फिर मां या किसी और को हिंसा को रोकते हुए नहीं देखता । साथ ही वह यह भी देखता है कि इस तरह की हिंसा के खिलाफ घर में कोई आवाज नहीं उठाता या नहीं टोकता है तो ये उसके मन में ये बात घर कर जाती है कि जो भी वह देख-सुन रहा है, वह सब सही है। और आगे चलकर वो भी वही हरकतें दोहराता है।


 हालांकि, कुछ मामलों में महिलाओं का भी बड़ा हाथ है। महिलाएं बेटे को कलेजे से लगा लेती हैं और बेटी को डपट कर किचन संभालने की जिम्मेदारी सौंप देती हैं। बेटे की गलती छिपाने के लिए अक्सर बेटी पर सारा दोष मढ़ देती हैं।

 

 औरतों को पीटने की घुट्टी

 समाज- कानून ने पिलाई


 15 वीं सदी में बने कानून 'ओल्ड इंग्लिश कॉमन लॉ’ में कहा गया था कि औरतों को उनकी गलतियों पर पीटा जाना चाहिए ताकि उन्हें सबक मिल सके। कानून में महिलाओं के लिए थोड़ी नरमी बरतते हुए कहा गया था कि पिटाई इतनी गंभीर न हो कि जानलेवा हो जाए या फिर महिला के शरीर या दिमाग को कोई स्थायी नुकसान पहुंचे।


 क्या होता है बच्चों पर इसका असर ? आईएमए के अध्यक्ष और मनोचिकित्सक डॉ. सुनील अवाना के मुताबिक, बच्चे अपने पिता को मारपीट करते व गाली गलौज करते देखते हैं तो उनके मन पर नेगेटिव असर पड़ता है। वे मां को बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन पिता से डरते हैं। ऐसे में डरे-सहमे रहते हैं और दब्बू बन जाते हैं। उनके मन में पिता के प्रति नफरत का भाव आ जाता है। चोरी, नशा या फिर साथियों से मारपीट करने जैसी गलत आदतों के शिकार हो जाते हैं। कुछ


 लड़कियां मां को पिटता देखकर इसे ही अपनी नियति मान लेती हैं तो कुछ को शादी शब्द से ही नफरत हो जाती है।

 अब जानते हैं कि घरेलू हिंसा के कितने रूप होते हैं....

 1. फिजिकल वायलेंस : इसी हफ्ते जोधपुर के एक टीचर पति ने घरेलू विवाद के बाद अपने बच्चों के सामने ही घर के बाहर पत्नी को बुरी तरह पीटा और कपड़े फाड़ दिए। 8 साल की बेटी और 5 साल का बेटा दूर खड़े सुबकते रहे। महिला रोती रही, न पति रुका, न वहां खड़े लोगों ने बचाया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने 13 सितंबर को आरोपी पति को गिरफ्तार किया।


 डॉ. अवाना कहते हैं कि इस तरह की घटनाएं न सिर्फ बच्चों पर बुरा असर डालती हैं, बल्कि आसपास मौजूद महिलाओं का भी मनोबल गिराती हैं और पुरुषों को सह देती हैं। पिटने वाली महिला कई महीनों तक खुद को अपमानित महसूस करती रहेगी, इससे उसके मन में कई दफा मरने तो कई दफा मारने के ख्याल भी आ सकते हैं।


 2. सेक्सुअल वायलेंस : राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य और सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट चारू वली खन्ना ने बताया कि गुरुग्राम की पॉश कॉलोनी में रहने वाली शालिनी (बदला हुआ नाम) का पति एक MNC में काम करता है, जिसका पैकेज 56 लाख रुपए सालाना है । पति हर दिन शालिनी के साथ जबरदस्ती करता है। शालिनी से कुछ गलत हो जाए या वह पलटकर जवाब दे दे तो इसकी सजा उसे बिस्तर पर मिलती है। वह शालिनी को सेक्स टॉय समझ उसे चोट पहुंचाता है। पीरियड्स में संबंध बनाने से मना करने पर वह जानवरों की तरह उस पर टूट पड़ता है।


 शालिनी ये सब सहती है, क्यों? इसके जवाब में वो चारू ने बताया कि ये समस्या शालिनी की ही नहीं, ज्यादातर महिलाओं की है। उसे लगता है कि घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई की महंगी फीस, लाइफस्टाइल का खर्च सब पति की कमाई पर टिका है। अगर वह शिकायत करती है तो उसके लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।


 जब जज ने कहा, 'पत्नी को ऐसे मारो कि दिखाई न दे' साल 1882 में अमेरिकी प्रांत मेरीलैंड दुनिया की


 पहली ऐसी जगह थी, जिसने पत्नी की पिटाई करने वाले पतियों के लिए 40 कोड़े या ज्यादा नुकसान पहुंचाने पर एक साल की सजा का नियम बनाया। ज्यादा नुकसान से मतलब पत्नी के चेहरे या शरीर के उन हिस्सों पर चोट से है, जो दिखाई दें।


 3. इमोशनल वायलेंस : दिल्ली के स्कूल की टीचर अनीता भारद्वाज ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर पसंद के लड़के से शादी की। शादी से पहले किए गए प्यार भरे वादे ससुराल पहुंचते ही तानों में बदल गए। जॉब भी छुड़वा दी गई और नौकरी के दौरान लांछन अलग लगाए। अनीता जो भी काम करतीं, उसमें ढेरों कमियां गिनाई जातीं। सारा दिन काम करवाते, उसका मजाक उड़ाते, बीमार पड़ने पर बहाना बनाने के आरोप लगते और खाने मिलती जूठन । तंग आकर अनीता ने घर और पति का साथ छोड़ दिया। आज वह फिर से नौकरी कर रही हैं। अनीता को जैसी परेशानी झेलनी पड़ी, उसे इमोशनल वायलेंस कहते हैं।


 चारू वली कहती हैं कि इमोशनल वायलेंस की शिकार कुछ महिलाएं महिलाएं बुरी तरह टूट जाती हैं और जो हो रहा है, उसे ही अपनी नियति मान लेती हैं, जबकि कुछ महिलाएं हिम्मत दिखाती हैं। वे इसके खिलाफ लड़ती हैं। कई बार सब एक झटके में छोड़कर नए सिरे से जिंदगी शुरू करती हैं। हालांकि, हिम्मत दिखाने वाली महिलाओं की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है।


 4. फाइनेंशियल वायलेंस: फिरोजाबाद की रहने वाली सुनीता का पति एक MNC में काम करता है। पैकेज भी सालाना 40 लाख रुपए है, लेकिन वह अपनी पत्नी को पाई-पाई के लिए तरसाता है। एक किलो तेल और एक किलो आलू का भी हिसाब रखता।


 वर्धा यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. सुनील सुमन बताते हैं कि इस तरह के मामलों का संसाधन की कमी या भविष्य की प्लानिंग से कोई लेना देना नहीं है। इस तरह के लोग जो बीवी को खर्च के लिए पाई-पाई को तरसाते हैं, वे खुद दीन-हीन तरीके से रहते हैं, जबकि लोगों के सामने अपनी संपत्ति


 का चौड़े होकर बखान करते हैं, यह एक तरह की सनक है।

 खतरनाक पहलूः खुद मर जाती है या फिर आरोपी को मार देती है

पीड़िता

 सर गंगाराम अस्पताल के मनोवैज्ञानिक डॉ. राजीव मेहता बताते हैं कि रोज मारपीट और गाली-गलौज झेलने वाली महिलाएं डिप्रेशन की मरीज हो जाती हैं। ये महिलाएं तीन परिस्थितियों से गुजरती हैं....


 1. ये महिलाएं उदास, डरी और सहमी रहती हैं। अकेलापन महसूस करती हैं। जरा सी आवाज पर चौंक पड़ती हैं। बोलते-बोलते रो पड़ती हैं। रात में ठीक से सो नहीं पातीं। खुद पर भरोसा खत्म हो जाता है। बच्चों पर गुस्सा निकालती हैं। उनके मन में सब छोड़कर कहीं चले जाने या सुसाइड करने के ख्याल आते हैं। कुछ महिलाएं सुसाइड भी कर लेती हैं।


 2. घरेलू हिंसा सहते-सहते कुछ महिलाएं अचानक से आक्रामक हो जाती हैं। वे हर हमले के जवाब में पलटवार करती हैं। कई बार तो वे आरोपी की जान तक ले लेती हैं।


 3. महिलाएं जब घर की मारपीट से तंग आ जाती हैं तो वे बाहर खुशी तलाशने लगती हैं। ऐसे में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर करना या फिर नशे की आदी हो जाने जैसी स्थिति बन सकती है।


 "बेटों को बताना होगा कि जितने अधिकार आपको हैं, उतने ही आपकी बहन को भी हैं। वक्त आ गया है कि हमारे घरों का पेरेंटिंग पैटर्न बदले, जहां


 "बेटों को बताना होगा कि जितने अधिकार आपको हैं, उतने ही आपकी बहन को भी हैं। वक्त आ गया है कि हमारे घरों का पेरेंटिंग पैटर्न बदले, जहां लड़के और लड़की में समानता, सम्मान और अधिकार का पाठ पढ़ाया जाए ।" दीपाली, 'ब्रेकथ्रु' की सदस्य

 क्यों महिलाओं पर हिंसक हो उठते हैं पुरुष ? घरेलू हिंसा और तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाने वाली डॉ. जाकिया सोमान कहती हैं कि समाज में पुरुषों का वर्चस्व रहा है। कम दहेज मिलना, पलटकर जवाब देना या बहस करना, संबंध बनाने से इनकार करना, बिना बताए कहीं जाना, पसंद का खाना न मिलना, इन मामूली बातों पर भी पति हिंसक हो जाते हैं। बांझपन या फिर बेटा पैदा न होने के लिए भी महिलाओं के साथ मारपीट होती है।

 जब अमेरिका में महिलाओं ने सरकार को झुकाया, बना कानून

 दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट मनीष भदौरिया बताते हैं कि 1970 में अमेरिका की महिलाएं घरेलू हिंसा के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं थीं। आंदोलन इतना जबरदस्त था कि अमेरिकी सरकार को ऐसा कानून बनाना पड़ा, जिसमें किसी महिला के साथ घरेलू हिंसा करने वाले के लिए एक दिन से लेकर 20 साल तक की कैद का प्रावधान किया गया। साथ ही मानसिक और शारीरिक रूप से आहत महिला के इलाज और काउंसलिंग के लिए एक लाख पाउंड से लेकर तीन लाख पाउंड तक मुआवजा देने की व्यवस्था की गई।


 बेटों को पानी में ग्लूकोज की तरह घोलकर पिलाएं कि ये गलत है


 लड़की पर हाथ उठाना लड़की को नीचा दिखाना लड़कियों को कमतर आंकना लड़कियों पर फब्तियां कसना


 सोर्स: घरेलू हिंसा के खिलाफ 'बेल बजाओ' कैंपेन चलाने वाली संस्था 'ब्रेकथ्रु'


 महिला आयोग बनने के बाद शुरू हुई घरेलू हिंसा पर अलग कानून बनाने की लड़ाई


 साल 1992 में महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए 'राष्ट्रीय महिला आयोग' बनाया गया। आयोग ने गठन के कुछ साल बाद ही लॉयर्स कलेक्टिव संस्था से 'डोमेस्टिक वायलेंस बिल' बनाने पर बातचीत शुरू की। साल 2001 में 'प्रोटेक्शन


 फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस बिल' लोकसभा में पेश हुआ, लेकिन पास नहीं हो सका। साल 2004 में लोकसभा भंग होने के साथ ही यह बिल भी लैप्स हो गया। इसके बाद 2005 में फिर से इस बिल को पेश किया गया जिसके बाद उसे कानून की शक्ल ले ली।


 कानून में औरत शब्द का किया गया इस्तेमाल, मजिस्ट्रेट के पास जाने का हक


 2005 में 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम' लाया गया, जिसके तहत फिजिकल, इमोशनल, सेक्शुअल और फाइनेंशियल तौर पर की जाने वाली प्रताड़ना को अपराध बताया गया । कानून में 'औरत' शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसके तहत मां, बहन, बेटी, पत्नी या फिर लिविंग पार्टनर आदि में से कोई भी घरेलू हिंसा की शिकार होने पर मजिस्ट्रेट के पास जा सकती है। कानून में हर जिले में 'सेफ हाउस' बनाने और प्रोटेक्शन ऑफिसर नियुक्त करने की व्यवस्था भी की गई। कानून में कहा गया है कि किसी भी हाल में पीड़िता को परिवार वाले घर से नहीं निकाल सकते हैं।


 पीड़ित महिलाएं मदद के लिए मिलाएं ये नंबर घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाएं अपनी मदद के लिए हेल्पलाइन 1091 और 100 पर मदद ले सकती हैं। इसके अलावा वे राष्ट्रीय महिला आयोग की हेल्पलाइन 7827170170 पर 011. 26944880 और 011. 26940148 पर कॉलकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

 महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्थाएं

 घरेलू हिंसा पर कहानियां पढ़ी होंगी, फिल्में भी देखी होंगी, लेकिन क्या आपने कभी उस पीटते पुरुष का हाथ रोकने की कोशिश की? क्या उस 12 साल के लड़के को डांट लगाई, जो बहन पर हाथ उठाता है। क्या कभी उस शख्स को टोका, जो अपनी पत्नी ही नहीं, मां से भी हाथापाई करता है? क्या उस महिला को समझाया, जो बेटे को बचाने और सही ठहराने के लिए सारी गलती बेटी के सिर मढ़ देती है? अगर नहीं तो सोचिए कहीं आप भी तो घरेलू हिंसा को बढ़ावा देने और स्वीकार करने वालों में शामिल तो नहीं?


 शायद... इसी वजह से हमारे घर में हो रही हिंसा को रोकने के लिए कानून बनने में 145 साल लग गए। बच्चों को संस्कारी बनाने वाली मां ने अगर बेटों को आज भी यह नहीं समझाया कि औरत पर हाथ उठाना गलत है। तो पुरुष मानसिकता को यह बात समझने में कहीं 150 साल और न लग जाएं। सोचकर देखिए...


 





  



 

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